तन्हा चलते चलते मुख़्तसर से रास्ते लम्बे लगने लगे है…

तन्हा चलते चलते मुख़्तसर से रास्ते लम्बे लगने लगे है,
हम अपने ही कदमों का कारवां बना के चले हैं

बेकदर बेखबर से हम युहीं चलने लगे है
मंजिल है सामने, और फितरत से मजबूर हम रास्ता भटकने लगे हैं

कभी तेरे दर से गुजरे, कभी मयखानों से
सिफर से गोल रास्तों में, रुक रुक के चलने लगे हैं

मुख़्तसर – Succinct, Brief

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Categories: Arz kiya hai!

थोडा सा तो खुदा होगा के बस नाम का है तू…

इल्म इतना है की बस मुझे कुछ और इल्म नहीं,
रिसालो पे रखे कलमे पढकर होती नेजात नहीं

अज़ान की आयतें भी जूठ-मूठ के वादे करती है
मेरी हाथो की लकीरों के आगे उनका कोई मोल नहीं

थोडा सा तो खुदा होगा के बस नाम का है तू
या मेरे आगे चलता तेरा कोई जोर नहीं?

इल्म – Knowledge, रिसालो – wooden platform on which you place the Holy Kuran, नेजात – Feeling of freedom, अज़ान – The Muslim call to prayer

Categories: Arz kiya hai!

I am not content, I’m still alive

NOTE: You may find this post from being too narcissist to egoistic to amateurish to bull shitting to too intense to just a random mess of chaotic thoughts to even useless mental masturbation or whatever you may think it to be. You may wanna read it at your own discretion.

I love this restlessness. The questions: “Who am I?” and “Why am I?” And then some more restlessness; but who the hell wants “inner peace”? Don’t come and tell me how to find it, where to find it. Keep it to yourself. Thank you broken memories for messing up with my head; I need you to screw it so badly that the only thing I feel is chaos. You want peace and happiness, I want chaos; we run in opposite directions. My peace is in my chaos, in the cacophony of rumbling thoughts.

The truth, laughing somewhere in oblivion; the mirror and the shadow – all have been asking the same questions: “What the hell are you doing? Are you happy? or Just trying to make others happy?”. Herein I found the answer to “Why am I?”. The purpose of being. If I am not in sync with myself, who the fuck am I trying to fool? Enough of fooling myself. Call it being selfish, but if I am not happy, it doesn’t matter whether anyone else is happy or not. How the fuck grumpy, sad and unhappy me gonna make you happy? I cannot fake happiness for you any longer. Take it or leave it. The purpose of being now is to live; just live. Live for self, live in the moment; holding onto nothing, yet holding onto something.

So, you want to take that something away? Take it all away; won’t stop you. But then take what you get and don’t whine about the choices I offer.

I ain’t looking for your approvals; I don’t care for your perceptions. I am not even going to ask you to let me be, for only I can decide to let me be and let it go. I would let it go till the only thing that resides in this mind, soul and the heart is the ego and my spirit; in the essence of being me. I don’t want to be an ideal human being, go figure it out for yourself. I am happy with my flaws, I love them to the death. Modesty is no longer my virtue. I am not going to judge you for burying me already, in your thoughts and heart; as far as soul is concerned, I doubt you have one that can see beyond self, yeah you are like me in some ways, surprised?

I want to run, I want an escape in the lands of chaos. I don’t give a damn for what you think. I need more clarity on the answers. I am not liking this a bit, yet I am happy.

At least I have questions that I seek answers for. I am not content, I’m still alive. I don’t want to make peace with myself, for I still can think, feel and live.

Oh Yeah! if you have a problem with lots of “I” above..its because; Who am I? I am “I”. Go, deal with it.

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बहेते से झरने जैसी तू, अल्हड सी बहे रही है…

बहेते से झरने जैसी तू
अल्हड सी बहे रही है
आँखों से बोलती तू
पलकों से कहे रही है
के हाँ ये प्यार है
इश्क का खुमार है

गहरे से सागर सा में
लहेरों सा उछल रहा हूँ
लबों से चुप सा हूँ
उँगलियों से लिख रहा हूँ
के हाँ ये प्यार है
इश्क का खुमार है

बिजली से गड-गडाते दोनों
एक दूजे पे बरस पड़े है
तेरे बदन की खुस्बो में
पहेली बारिश से भीग रहे है

बने झरना कभी, कभी बने सागर
मिलना है हमें यूँ ही अक्सर
कभी बादल के बहाने
कभी चाँद के सिरहाने
कभी लहेरों से बनकर
कभी लहेरों में सिमटकर
तू मुझसे मिल रही है
में तुझसे मिल रहा हूँ

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My Musings..

किस्तों किस्तों में बिका हूँ, तुने ख़रीदा नहीं था,
कभी कहेते थे मुझसे ज़मानेवाले मेरा कोई मोल नहीं था

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कभी उँगलियों से हम रेत पे तुम्हारा नाम लिखते है,
मुस्कुराते है, और फिर लहेरों का इंतज़ार करते है

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फकीरी ऐसी है के खुदा भी मुझसे कुछ मांगता है,
अब हमें अपनी दुआ बांटने की आदत सी हो गयी है

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हमे भी सिखा दे राज़ बेरुखी का, हम तो बेखुदी में ही जीया करते हैं.
जिस उल्फत में जीते थे कभी, उसी उल्फत में मरे जा रहे हैं.

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खुदा तू है कैसे मानु ये, के तू कहीं नहीं दीखता
आ के मिल मुझसे कभी मयखाने में
पहेचन है तेरी क्या ये तो बता दे कभी
बिना पिए तो मुझे मेरा अक्स भी खुद सा नहीं दीखता

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अब्र को देख के बारिश की आस क्यों है?
भूल गया कल सुखी नंगी धरती पे तेज़ाब बरसा था,
तू हँसा था दिल से जब जब, खुदा रोया था

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इल्म इतना है की बस मुझे कुछ और इल्म नहीं,
रिसालो पे रखे कलमे पढकर होती नेजात नहीं

अज़ान की आयतें भी जूठ-मूठ के वादे करती है
मेरी हाथो की लकीरों के आगे उनका कोई मोल नहीं

थोडा सा तो खुदा होगा, के बस नाम का है तू
या मेरे आगे चलता तेरा कोई जोर नहीं?

इल्म – Knowledge, रिसालो – wooden platform on which you place the Holy Kuran, नेजात – Feeling of freedom, अज़ान – The Muslim call to prayer

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आज कल आईने के सामने ही नमाज़ पढने लगे है,
हम अपने ही खयालो के असीर बन बैठे है

सुखी हथेलियों में बुझती रेखाए देखने लगे है,
हम अपने ही आप से दुआ मांग बैठे है

असीर – Prisoner

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थोड़ी सी जो जान बची है, उसको भी छीन लेगा क्या
ज़रा सोच ज़िन्दगी देने वाले, तुने जिंदा कब रख्खा?

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ख़ामोशी के परिंदों ने शोर मचाया होगा,
अंदाज़-इ-गुफ्तगू कुछ अलग ही है तेरा,
खलिश में भी तू मुस्कुराया होगा

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दिल में एक आतिश सी ले बैठे हैं,
दस्तार-ए-गुरुर बाँध बैठे है,
वजूद खुद का खुदा से भी है प्यारा,
हम खुद अपने ही खुदा बन बैठे है

दस्तार – Turban

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राख से रुखी थी ज़िन्दगी,
न ख़ाक में मिलने दूंगा
दफनाया है कहीं बार मुझे लोगों ने,
अब जलाने भी नहीं दूंगा

राख करके बहा दो पानी में,
बरस के फिर लौटूंगा
तपिश तुम्हारी भी बढ़ेगी कभी,
तब खारा पानी बनके बरसुंगा

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मसर्रत है अपने ही आप में
यहाँ वहां क्या ढूंढे तू

कब तक लिखेगा युहीं सोच सोच कर
बेजिजक दिल की बात लिख तू

हिज्र की रात है, खुद से खुद की
बारहा सहर तक लिख तू

मसर्रत – Happiness, हिज्र – Separation

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Categories: My Musings

आगाज़-ए-इश्क का कैफ ऐसा है

आगाज़-ए-इश्क का कैफ ऐसा है
सोच ना इश्क-ए-मुस्तकबिल कैसा होगा

तरन्नुम-ए-अंदलीब सा हसेगी वोह
नूर-ए-बद्र में इजहार सा होगा

खल्वत में जब उनका जिक्र आएगा
दिल-ए-इख्तियार ना होगा

पाबंदी-ए-अरमान जितना भी हो
मुक़म्मल ये फांसला होगा

तौबा तौबा करेंगे दुनियावाले
उनका इश्क-ए-परस्त कोई और होगा

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कैफ – happiness, मुस्तकबिल – future, अंदलीब – nightingale, बद्र – moon, खल्वत – solitude, इख्तियार – control, परस्त – worshiper

Categories: Arz kiya hai! Tags:

Forbidden

Somewhere in Heaven; Maybe Hell:

Adam: I hate it!

Eve: What?

Adam: These guys cursing us every day for eating the forbidden fruit.

Eve: Yeah Darling! But why so upset?

Adam: Fuckers don’t know that they came into being not because of the fruit; but because we fucked the hell outta each other that night.

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